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पुरानी नियुक्तियां सुरक्षित, CSE 2025 का रास्ता खुला; क्रीमी लेयर पर SC की लकीर

ओबीसी क्रीमी लेयर पर 11 मार्च के फैसले का दायरा साफ करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुरानी चयन प्रक्रियाएं, नियुक्तियां और वरिष्ठता फिर से नहीं खुलेंगी। लेकिन CSE 2025 के ओबीसी उमेदवारों के सेवा आवंटन पर फैसला लागू रहेगा। सरकार को पालन के लिए दो महीने और मिले हैं।

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को लंबी बहस का फैसला सुनाया — जो हो चुका है वह नहीं बदलेगा, लेकिन जो बाकी है वह अब रुकेगा नहीं।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने ओबीसी क्रीमी लेयर पर 11 मार्च 2026 के फैसले का दायरा साफ किया। सरकार ने उस फैसले का मतलब निकालते हुए यह मान लिया था कि वह पीछे की तारीख से लागू होगा और सालों की भर्तियां उलट जाएंगी। कोर्ट ने यही अनुमान खारिज किया।

"11 मार्च 2026 का फैसला इस अदालत के सामने पक्षकारों के अधिकार तय करता है," बेंच ने कहा। जो उमेदवार कोर्ट आए थे, वे ओबीसी गैर-क्रीमी लेयर में आते हैं और उन्हें आरक्षण का लाभ तथा उससे जुड़ी पदस्थापना मिलनी चाहिए।

लेकिन अगली पंक्ति ही सबके लिए अहम है। "ऐसे लाभ से किसी और की वरिष्ठता को नुकसान नहीं होगा, और न ही पहले पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाएं या नियुक्तियां दोबारा खोली जाएंगी।" 11 मार्च से पहले पूरी हुई भर्तियां इस फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खुल सकतीं।

लेकिन एक मांग ठुकराई गई। CSE 2025 का नतीजा 6 मार्च को आया था, पर सेवा आवंटन नहीं हुआ था। "आवंटन की प्रक्रिया लंबित है और लागू करने में देरी की कोई ठोस वजह नहीं है," कोर्ट ने कहा। इसलिए 2025 के ओबीसी उमेदवारों के सेवा आवंटन पर 11 मार्च का सिद्धांत लागू होगा।

सरकार की चिंता बड़ी थी। 2016 से 2025 के बीच करीब 5.69 लाख आरक्षित पद भरे गए, जिनमें लगभग 3.7 लाख ओबीसी पद थे, यह सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया था। इसका असर हुआ तो सेवा आवंटन, वरिष्ठता, प्रोन्नति और शैक्षणिक दाखिलों पर पड़ेगा, ऐसी आशंका सरकार ने जताई।

कोर्ट ने बीच का रास्ता निकाला। विवाद की जड़ 1993 की कार्यालयीन अधिसूचना और 2004 के स्पष्टीकरण की व्याख्या आगे की भर्तियों पर लागू होगी। 11 मार्च के बाद के सभी चयन, नियुक्तियां और रोस्टर के तहत आवंटन उसी अधिसूचना से तय होंगे। जिनके दावे दूसरी अदालतों या प्राधिकरणों में लंबित हैं, उन पर गुण-दोष के आधार पर अलग से विचार होगा।

क्रीमी लेयर की नीति बनाने का अधिकार विधायिका और कार्यपालिका के पास है, यह कहते हुए कोर्ट ने पदों की समतुल्यता तय करने की समयसीमा देने से इनकार किया। पालन की मियाद दो महीने बढ़ा दी गई है।