नई दिल्ली: चुनाव में झूठा हलफनामा दाखल करने के आरोप में चुने गए प्रतिनिधि के खिलाफ कोई भी निजी नागरिक मजिस्ट्रेट के पास आपराधिक शिकायत ले जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला देते हुए कहा कि ऐसी शिकायतों के लिए चुनाव आयोग की पूर्व मंजूरी या आयोग की शिकायत की जरूरत नहीं है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और शील नागू की बेंच ने कहा कि कानूनी प्रावधानों की व्याख्या कैसे हो, यह आयोग अपने प्रेस नोट या गाइडलाइन के जरिए तय नहीं कर सकता। 16 अक्टूबर को सुनाए गए फैसले में बेंच ने कहा, 'हम मानते हैं कि लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए के तहत निजी शिकायत को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 195 की कसौटी से नहीं गुजरना पड़ेगा।'
लोक प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 125-ए ऐसे उम्मीदवार को सजा देती है जो चुनकर आने के इरादे से तय जानकारी नहीं देता, जानबूझकर झूठी जानकारी देता है या नामांकन पत्र या हलफनामे में जरूरी जानकारी छिपाता है। इस अपराध में छह महीने तक जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
हाई कोर्ट ने माना था कि इस प्रावधान के तहत शिकायत को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) की शर्त पूरी करनी होगी, जो कुछ अपराधों में संबंधित लोकसेवक की लिखित शिकायत के बिना अदालत को संज्ञान लेने से रोकती है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने कहा था कि आपराधिक कार्यवाही व्यक्तिगत मतदाता नहीं, चुनाव आयोग शुरू करे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह व्याख्या खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि धारा 195 भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 172 से 188 तक के अपराधों पर साफ तौर पर लागू है, लेकिन इसमें चुनाव कानून की धारा 125-ए शामिल नहीं है। संसद ने 2002 में धारा 125-ए लाई और 2006 में धारा 195 में संशोधन किया, फिर भी चुनाव कानून के अपराध को इस पाबंदी में नहीं रखा। कोर्ट ने माना कि यह चूक जानबूझकर मानी जानी चाहिए।
यह फैसला राजकुमार मडकी की अपील पर आया, जिन्होंने बीदर के विधायक शैलेंद्र बेलदाले (2023 में निर्वाचित) के खिलाफ अपनी शिकायत रद्द करने वाले कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। मडकी का आरोप था कि बेलदाले ने नामांकन हलफनामे में झूठा पता दिया।
कोर्ट ने कानूनी सवाल निजी शिकायतकर्ताओं के पक्ष में तय किया, लेकिन बेलदाले के खिलाफ कार्यवाही बहाल करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों ने आरोप को काट दिया है और सजा की संभावना कम है।
परेशान करने वाली शिकायतों के खतरे पर बेंच ने कहा कि फिजूल शिकायतों से निपटने के अधिकार मजिस्ट्रेट के पास हैं। कोर्ट ने कहा कि उसे आयोग के 16 जून 2020 के प्रेस नोट पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। बेंच ने कहा, 'कानूनों की व्याख्या मुख्य रूप से अदालतों का काम है और ऐसी गाइडलाइन हमें नहीं बांधती।'