नई दिल्ली: आई-पैक दफ्तर पर छापे के वक्त कथित रुकावट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ के सामने सुनवाई हुई.
फैसला एक सीमित सवाल पर सुरक्षित है — मामला सीबीआई को भेजा जाए या नई राज्य सरकार पर छोड़ा जाए. सीबीआई जांच और एफआईआर की मांग वाली याचिका प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दायर की है.
पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा तत्कालीन पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार, तत्कालीन कोलकाता पुलिस आयुक्त मनोज कुमार वर्मा और तत्कालीन दक्षिण कोलकाता के डिप्टी कमिश्नर प्रियब्रत रॉय याचिका में प्रतिवादी हैं.
बनर्जी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अब वह मुख्यमंत्री नहीं हैं, राज्य की सत्ता दूसरे दल के हाथ में है और राज्य सरकार खुद यह मामला सीबीआई को भेज सकती है. फिर अदालत के आदेश की जरूरत क्या है, ऐसा सवाल उन्होंने किया. ऐसा करने पर राजनीतिक मंशा का आरोप नहीं लगेगा, ऐसा उन्होंने कहा.
ईडी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने विरोध किया. राज्य सरकार पर छोड़ने से जांच पर पक्षपात के आरोप लगेंगे, ऐसा उनका कहना था. आरोपियों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं, जो जांच को प्रभावित कर सकते हैं, यह मुद्दा भी उन्होंने उठाया. दोनों पक्षों के मामले एक ही एजेंसी के पास होने की मांग भी उन्होंने की.
मामले की पृष्ठभूमि यह है. 8 जनवरी को कोयला घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच में ईडी की टीम ने कोलकाता में आई-पैक के दफ्तर और सह-संस्थापक प्रतीक जैन के घर पर छापे मारे थे. उस वक्त बनर्जी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ वहां पहुंचीं और अधिकारियों से बहस की, ऐसा ईडी का आरोप है. कुछ फाइलें भी वह ले गईं, ऐसा आरोप लगा.
बनर्जी ने आरोपों को खारिज किया है. उनका कहना है कि वह तृणमूल कांग्रेस का गोपनीय और मालिकाना डेटा वापस लेने गई थीं.
15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन छापों को लेकर पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगाई थी और सीसीटीवी फुटेज समेत डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने का आदेश दिया था.