नई दिल्ली: भारत के सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार में तीन लाइसेंसधारी हैं, कैबिनेट के लिए कीमत का फॉर्मूला लगभग तैयार है, पर एक भी व्यावसायिक सेवा शुरू नहीं हुई। अटक सुरक्षा मंजूरी पर है, जो गृह मंत्रालय ने तीनों में से किसी को अब तक नहीं दी है।
वनवेब इंडिया कम्युनिकेशंस, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशंस, तीनों के पास जीएमपीसीएस अनुमति वाला यूनिफाइड लाइसेंस है। संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुताबिक तीनों एक ही पड़ाव पर हैं। उन्होंने कहा कि लाइसेंस तीन पक्षों को मिल चुका है और जब वे अलग-अलग सुरक्षा शर्तें पूरी कर लेंगे, तब परिचालन शुरू कर सकेंगे।
जिन शर्तों की जांच हो रही है, वे औपचारिक नहीं हैं। अधिकारी डेटा लोकलाइजेशन, गेटवे एक्सेस और टर्मिनल सुरक्षा देख रहे हैं। यही वे बिंदु हैं जो किसी विदेशी ऑपरेटर को भारतीय कानून के प्रति जवाबदेह रखते हैं। स्टारलिंक के टर्मिनल छोटे और सुवाह्य हैं, और बिना पंजीकरण वाले सेट दूसरे देशों के संघर्ष क्षेत्रों और ग्रे बाजारों में मिल चुके हैं।
विवाद तब सार्वजनिक हुआ जब एलन मस्क ने एक्स पर लिखा कि कुछ 'ऑलिगार्क' स्टारलिंक को रोक रहे हैं। इसके बाद उन्होंने पूछा कि भारत को प्रधानमंत्री चलाते हैं या रिलायंस के मुकेश अंबानी। रिलायंस ने कहा कि वह प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है और हर खिलाड़ी को भारतीयों की सेवा तथा भारतीय कानून का पालन करना होगा। भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल ने कहा कि उन्होंने पांच साल पहले आवेदन किया था और कतार में आगे हैं। अगस्त में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र ने सुरक्षा चिंताओं के आधार पर स्टारलिंक की मंजूरी की मांग खारिज की थी।
पैसे का सवाल लगभग तय हो चुका है। कैबिनेट से डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन की उस सिफारिश को मंजूरी मिलने की उम्मीद है, जिसमें समायोजित सकल राजस्व का 5 फीसदी स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क रखा गया है। सरकार की ओर से अधिसूचित दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों के लिए इसमें एक फीसदी की छूट है। टेलीकॉम कंपनियों ने सैटकॉम खिलाड़ियों पर प्रति उपभोक्ता 500 रुपये का शहरी शुल्क मांगा था, जो खारिज हो गया।
बहस को नीति से पहले कीमत सुलझा सकती है। पिछले साल स्टारलिंक का 50 से 200 एमबीपीएस वाला सालाना प्लान 2,15,600 रुपये का था, जो बड़े भारतीय ब्रॉडबैंड ऑपरेटरों के दाम से करीब 10 से 14 गुना ज्यादा है।