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अस्पतालों का ज्यादा शुल्क वसूलना कदाचार है, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में माना

दवाओं और चिकित्सा उपकरणों पर अस्पतालों द्वारा ज्यादा एमआरपी वसूलने के 'कदाचार' को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है। 935 दवाओं के लिए अधिकतम कीमतें तय करने की भी बात शपथ पत्र में कही गई है।

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नई दिल्ली: दवाओं और चिकित्सा उपभोग सामग्री पर अस्पतालों द्वारा ज्यादा अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) वसूलने के "कदाचार" को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है और कहा कि वह इस समस्या की जांच कर हितधारकों के परामर्श से उचित उपाय तय कर रही है।

सभी दवाओं और चिकित्सा सामग्री की कीमतें सीमित करने के मुद्दे पर दाखिल शपथ पत्र में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने कहा कि अस्पतालों के सामने मरीजों की सौदेबाजी की स्थिति बहुत कमजोर होती है। इसमें कहा गया कि भारत में सस्ती दवाएं बनाने वाली कंपनियां होने के बावजूद मरीजों को उत्पादन लागत से कहीं ज्यादा रकम चुकानी पड़ती है और अस्पताल उनसे ज्यादा शुल्क वसूलते हैं।

"भारतीय दवा बाजार काफी प्रतिस्पर्धी है... सामान्य तौर पर जहां पर्याप्त प्रतिस्पर्धा होती है, वहां कीमतें नियंत्रित करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन स्वास्थ्य उपचार और दवा उत्पादों में मरीज तथा खुदरा दवा विक्रेता, अस्पताल की दवा दुकानें, इलाज करने वाले अस्पताल और डॉक्टरों के बीच जानकारी और सौदेबाजी की असमानता होती है," शपथ पत्र में कहा गया। इसमें कहा गया कि दवाओं, उनके विकल्पों और कीमतों की मरीज की जानकारी सीमित होती है, इसलिए निर्माताओं में प्रतिस्पर्धा के बावजूद कदाचार होता है।

सरकार ने कहा कि 935 सूचीबद्ध दवाओं के लिए अधिकतम कीमतें और 3,881 नई दवाओं की खुदरा कीमतें तय की गई हैं। शपथ पत्र में कहा गया कि सरकार समस्या से अवगत है और उचित उपायों पर विचार कर रही है।

यह शपथ पत्र डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिका पर दाखिल किया गया। उन्होंने नीति आयोग की रिपोर्ट और 2020 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के बयान का हवाला दिया था कि स्वास्थ्य पर खर्च के कारण हर साल करीब छह करोड़ परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। सरकार के जवाब में माना गया कि ऐसी असमानता के कारण नियमन की जरूरत है।