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वरिष्ठ अभिनेत्री मधु कांबीकर का निधन, लावणी और अभिनय की समृद्ध विरासत खोई

लोककला की परंपरा सहेजते हुए लावणी को गरिमा और नई पहचान दिलाने वाली वरिष्ठ अभिनेत्री मधु कांबीकर का निधन मराठी कला जगत के लिए बड़ी क्षति है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और सांस्कृतिक कार्य मंत्री ॲड. आशीष शेलार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है।

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वरिष्ठ अभिनेत्री और लावणी कलाकार मधु कांबीकर
फ़ोटो: Internet

लोककला का झंडा बुलंद करने वाली बहुमुखी सितारा चली गईं: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शोक व्यक्त करते हुए कहा, "लोककला से लेकर रंगमंच और फिल्मी दुनिया तक मधु कांबीकर का कलात्मक सफर बेहद समृद्ध और खास रहा। लावणी की पारंपरिक शैली को संजोए रखते हुए उन्होंने कथ्थक के अभ्यास से नृत्यांगना के रूप में बड़ी पहचान बनाई। अपनी नृत्य शैली और नजाकत से उन्होंने लावणी को अलग गरिमा दिलाई, और रुपहले पर्दे पर भी लावणी के रूप को और निखारकर दिखाया।"

आगे बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, "मराठी फिल्मी दुनिया में उन्होंने दमदार अभिनय से कई तरह की भूमिकाएं निभाईं। उनका यह कलात्मक सफर इस क्षेत्र की दो पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक और प्रेरणादायी रहा है। वरिष्ठ अभिनेत्री मधु कांबीकर का निधन कला क्षेत्र की ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। आज मराठी लोककला का झंडा रुपहले पर्दे पर गर्व से लहराने वाली बहुमुखी सितारा हमें छोड़कर चली गई है। हम कांबीकर परिवार और मधूताई के सभी प्रशंसकों के दुख में शामिल हैं। ईश्वर इन सभी को यह आघात सहने की शक्ति दे।"

लावणी को सम्मान दिलाने वाली कलाकार खो दी: सांस्कृतिक कार्य मंत्री ॲड. आशीष शेलार सांस्कृतिक कार्य मंत्री ॲड. आशीष शेलार ने भी मधु कांबीकर के निधन पर गहरा दुख जताया। "महाराष्ट्र की लोककला की विरासत को अपने नृत्य और अभिनय से अमर करने वाली वरिष्ठ कलाकार हमने खो दी है। लावणी की पारंपरिक शैली को जीवित रखते हुए उन्होंने अपने नृत्य कौशल से इस लोककला को नई ऊंचाई दी। कथ्थक के गहन अध्ययन से निखरी नृत्य शैली, सहज अदाकारी और विविध भूमिकाओं को न्याय देने वाला दमदार अभिनय उनकी कला यात्रा की प्रमुख विशेषताएं थीं। उनकी कला साधना से लोककला की विरासत अगली पीढ़ियों तक पहुंची है, और नई पीढ़ी के लिए उनका योगदान हमेशा प्रेरणादायी रहेगा," श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा।

फिल्मों और रंगमंच पर योगदान मधु कांबीकर ने लावणी, लोककला, रंगमंच और फिल्म, इन तीनों माध्यमों में अपनी बहुमुखी कला की अमिट छाप छोड़ी। परदे पर उनकी निभाई कई भूमिकाएं आज भी दर्शकों को याद हैं: शापित झाकली मूठ सव्वा लाखाची एक डाव धोबीपछाड हळद रुसली कुंकू हसले आशी ही बनवाबनवी बाई मी भोळी सख्या सजना चोरीचा मामला

इसके अलावा 'सखी माझी लावणी' जैसे रंगमंचीय लोककला कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने पारंपरिक लावणी को सम्मान के साथ घर-घर और पढ़े-लिखे दर्शकों तक पहुंचाया। उनके निधन से मराठी कला जगत का एक मार्गदर्शक और दीपस्तंभ जैसा व्यक्तित्व हमारे बीच नहीं रहा।