नई दिल्ली: पहाड़ी सड़क के आखिर में सिग्नल छूट जाता है, समुद्र में नाव पर नेटवर्क नहीं मिलता, जंगल में तो कुछ भी नहीं. यह सूची अब कागज पर छोटी होने लगी है.
टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई ने 5 नवंबर की सिफारिशों में सैटेलाइट से सीधे फोन जोड़ने यानी डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवा के लिए छह मोबाइल बैंड इस्तेमाल करने का प्रस्ताव रखा है — 600, 700, 800, 900, 1800 और 2100 मेगाहर्ट्ज़. ये सारे बैंड फिलहाल मोबाइल सेवा में ही इस्तेमाल होते हैं.
सैटेलाइट कंपनी अपनी मर्जी से यह स्पेक्ट्रम नहीं ले सकेगी. उसे उस बैंड वाले टेलीकॉम ऑपरेटर से समझौता करना होगा और वह समझौता देश के सभी 22 लाइसेंस वाले सेवा क्षेत्रों पर लागू होगा. एक या ज्यादा पात्र ऑपरेटर मिलकर यह सुविधा दे सकते हैं.
दूसरी सिफारिश 2027 के विश्व रेडियो संचार सम्मेलन से जुड़ी है. ट्राई ने उसका नतीजा आने का इंतजार किए बिना यह सेवा शुरू करने की इजाजत सुझाई है, शर्त एक ही है — सेवा मौजूदा नेटवर्क में बाधा न डाले और खुद बाधित होने पर संरक्षण का दावा न करे. एल और एस बैंड के लिए अलग सिफारिशें हैं.
हाथ में पकड़े फोन को लेकर ट्राई ने सरकार से कहा है कि देश में बिकने वाले फोन में जरूरी मॉड्यूल लगाने के लिए निर्माताओं को प्रोत्साहित किया जाए. हर हैंडसेट में सैटेलाइट कनेक्टिविटी अनिवार्य करने की सिफारिश नहीं की गई है.
साथ में नई लाइसेंस श्रेणी भी प्रस्तावित है. दूरसंचार कानून, 2023 के तहत 'सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क प्रोवाइडर' अधिकृतता 20 साल के लिए होगी, अगले 20 साल के नवीनीकरण के विकल्प के साथ. शुल्क समायोजित सकल राजस्व का 8 फीसदी, कोई न्यूनतम लाइसेंस शुल्क नहीं. एंट्री फीस 37.5 लाख रुपये, न्यूनतम पूंजी और नेटवर्थ 60-60 लाख रुपये. सैटेलाइट स्पेक्ट्रम मिलने पर सालाना प्रति मेगाहर्ट्ज़ 3,500 रुपये न्यूनतम शुल्क. स्पेक्ट्रम का आवंटन पांच साल के लिए, दो साल बढ़ाया जा सकेगा.
सुरक्षा की शर्तें सख्त हैं. भारत में शुरू या खत्म होने वाला सैटेलाइट ट्रैफिक देश के भीतर के गेटवे से ही गुजरेगा, कानूनी तौर पर सुनवाई और रोकथाम की सुविधा होगी, और अधिसूचित संवेदनशील इलाकों में सिग्नल बंद किया जा सकेगा.
ये सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं. ट्राई ने इन्हें 31 पक्षों के जवाब, 12 प्रतिजवाब और जुलाई 2026 की खुली बहस के आधार पर तैयार किया है. अब दूरसंचार विभाग तय करेगा कि क्या स्वीकार करना है.
स्टारलिंक, भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस जियो के पास भारत में सैटेलाइट इंटरनेट बेचने का लाइसेंस है. तीनों अभी बड़े पैमाने पर सेवा शुरू नहीं कर पाए हैं. सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम की कीमत का फैसला बाकी है.
फोन खरीदने वाले के लिए इसमें से कुछ भी इस साल नहीं आएगा. पहले सरकार की मंजूरी चाहिए, फिर हैंडसेट में तकनीक पहुंचेगी.