चेन्नई: मद्रास हाई कोर्ट का आदेश दोपहर में आया और शाम तक सेंट्रल क्राइम ब्रांच की टीम अंबिल महेश पोय्यामोझी को अमीनजीकरई के एक फ्लैट से उठा ले गई।
2021 से 2026 तक स्कूल शिक्षा विभाग संभालने वाले वे पूर्व मंत्री अब उस मामले में आरोपी हैं, जिसकी शुरुआत निजी स्कूलों को खाली वादों पर टिकाए रखने की शिकायत से हुई थी।
न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने सोमवार को उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सीसीबी ने पोय्यामोझी को आरोपी तभी बनाया, जब उसे ऐसे सबूत मिले जिनसे पता चला कि पैसा वसूला गया और उसे ‘पार्टी फंड’ कहा गया।
शिकायत तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स फेडरेशन के सचिव सी. एलंगोवन ने चेन्नई पुलिस आयुक्त को दी थी। इसमें 59 वर्षीय बी. टी. अरसाकुमार का नाम था, जिन पर ‘तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन’ नाम के एक अपंजीकृत संगठन के जरिए बड़ी रकम वसूलने का आरोप है। अरसाकुमार को बाद में गुंडा एक्ट के तहत हिरासत में लिया गया।
आरोप ठोस है। स्कूल प्रबंधनों से कहा गया कि उनकी अटकी फाइलें आगे बढ़ेंगी — स्थायी मान्यता, स्कूल अपग्रेड करने की अनुमति, डीटीपीसी से भवन योजना की मंजूरी — क्योंकि एसोसिएशन की तत्कालीन सत्ता से ‘नजदीकी’ है। पैसा आ गया, फाइलें नहीं बढ़ीं।
जांचकर्ताओं का कहना है कि कम से कम ₹100 करोड़ की कथित वसूली से जुड़े 177 निजी स्कूलों की पहचान हुई है। एफआईआर पहले भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5) और 318(4), साथ में धारा 3(5) के तहत दर्ज हुई थी। बाद में अभियोजन ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने संशोधन रिपोर्ट देकर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 और 12 जोड़ने और पूर्व मंत्री को आरोपी बनाने की मांग की।
पुलिस सूत्रों के अनुसार पोय्यामोझी के करीबी बताए जाने वाले मुथुकुमार फरार हैं और टीमें उन्हें तलाश रही हैं।
पोय्यामोझी ने पहले एफआईआर रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था और आरोपी बनने के बाद अग्रिम जमानत मांगी थी। दोनों रास्ते अब बंद हैं।
यह गिरफ्तारी राज्य की पिछली डीएमके सरकार के एक पूर्व कैबिनेट मंत्री को भ्रष्टाचार मामले में हिरासत में ले आती है, और यह ऐसे वक्त हुई है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच स्कूल लाइसेंस बांटने को लेकर बहस चल रही है। आरोपों पर अभी मुकदमे में फैसला नहीं हुआ है।
जिन स्कूल प्रबंधनों ने मूल शिकायत की थी, उनका रिकॉर्ड पर दावा सीधा है: मंजूरियों के लिए पैसा दिया गया, मंजूरियां कभी नहीं आईं।