नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रामलीला मैदान और जंतर-मंतर के प्रदर्शनों पर दोहरा रुख अपनाया। विरोध का हक बना रहेगा, लेकिन किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अक्टूबर में हुए प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं का जत्था था। "आप किसी जगह पर हमेशा कब्जा नहीं रख सकते। दूसरे प्रदर्शनकारी भी हैं। किसान कहां जाएंगे? मजदूर कहां जाएंगे? ट्रेड यूनियन कहां जाएंगे? बेघर लोग कहां जाएंगे? विरोध का हक सबका है," सीजेआई ने कहा।
कोर्ट ने कहा कि इजाजत देने या मना करने के आदेश में वजह लिखी जानी चाहिए और तय अवधि के लिए तय समय दिया जाना चाहिए।
दिल्ली के व्यापारी संगठनों की ओर से सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि रामलीला मैदान के आसपास करीब 50 लाख लोग रहते हैं और कनॉट प्लेस समेत बाजार बंद हैं। उन्होंने त्योहारी सीजन में बिक्री गिरने का दावा किया और अगले दो महीने प्रदर्शनों पर रोक मांगी। एक व्यापारी संगठन ने 10,000 से 12,000 करोड़ रुपये तक के नुकसान का अनुमान जताया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जुलाई के प्रदर्शन की इजाजत एक दिन के लिए थी, लेकिन जगह 17 दिन कब्जे में रही। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने बिना इजाजत संसद की ओर मार्च किया। उन्होंने कहा कि लोगों को हिरासत में नहीं लिया गया, सिर्फ हटाया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि जंतर-मंतर अधिसूचित प्रदर्शन स्थल है और करीब 7,000 लोग हिरासत में लिए गए। उन्होंने पूछा कि लोकतंत्र का क्या हुआ। सीनियर वकील प्रशांत भूषण ने निगरानी का स्वरूप और उसका कानूनी आधार पूछा। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सीसीटीवी के अलावा कुछ नहीं है।
कोर्ट ने व्यापारी संगठनों को प्रदर्शन के आयोजकों को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। "आयोजकों को सुने बिना कोई कोर्ट इस सवाल का फैसला नहीं कर सकता," बेंच ने कहा। किराना कमेटी दिल्ली की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी हुआ।
प्रदर्शनों के बाद की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं को नौ श्रेणियों में बांटा जाएगा। महिला पत्रकारों से जुड़ी शिकायतों पर दिवाली के बाद अलग सुनवाई होगी। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को है।