नागपुर: 'सिर्फ सत्ता या व्यवस्था बदल देने से समस्याएं हल नहीं होतीं।' यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को नागपुर में कही, जहां संघ का शताब्दी वर्ष का समापन समारोह चल रहा था। रेशिमबाग मैदान पर विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने आंदोलनों पर साफ रुख रखा। चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे देशव्यापी प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में यह भाषण हुआ।
भागवत ने कहा कि समाज में समस्याएं रहती हैं और व्यवस्था में गड़बड़ होने पर आंदोलन उभरना स्वाभाविक है। लेकिन अनुभव बताता है कि न सिर्फ सरकार हर समस्या सुलझा सकती है और न ही यह सच है कि समस्याएं सिर्फ आंदोलनों से सुलझती हैं। समाधान समाज के सक्रिय सहभाग और आपसी संवाद से भी निकल सकते हैं।
उन्होंने चेताया कि जब आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या विचार के खिलाफ नफरत की वजह से सियासत का हथियार बन जाता है, तो भारत को कमजोर करने की कोशिश करने वाली ताकतें इसका फायदा उठाती हैं। प्रशासन और प्रदर्शनकारियों, दोनों से उन्होंने कहा कि भावनाएं भले तेज हों, कदम संविधान और कानून की सीमा में ही रहने चाहिए।
भागवत का असली निशाना विदेशी ताकतें थीं। उन्होंने कहा कि पश्चिम से एक तूफान आया है, जो सभ्यता और मानवीय मूल्यों को मिटाना चाहता है। फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में भी ऐसी ही कोशिशें हो सकती हैं। 'रेजीम चेंज से परिस्थितियां बदलेंगी, ऐसा कभी नहीं हुआ है और आज भी नहीं होगा,' उन्होंने कहा। उनका दावा था कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और संघ को तोड़ने की योजना बना रही हैं।
वंदे मातरम पर उन्होंने कहा कि यह गीत आज भी राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा देता है और इसे पूरा गाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। उन्होंने भाषण की शुरुआत संत रविदास और स्वामी श्रद्धानंद को श्रद्धांजलि से की।
समारोह में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, इजराइल के मिड-वेस्ट इंडिया के महावाणिज्य दूत यानिव रेवाच, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी मौजूद थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भागवत के भाषण को 'अत्यंत प्रेरणादायी' बताया। संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी।