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आज रात 11.51 बजे नाविक की रीढ़ मजबूत करने वाली उड़ान; इसरो के रॉकेट में बड़ा बदल

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आज रात 11.51 बजे श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट से एनवीएस-03 नेविगेशन उपग्रह प्रक्षेपित करेगा। 2,232 किलो वजनी यह उपग्रह जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा में छोड़ा जाएगा। इस बार इसरो उपग्रह के पायरो वॉल्व पहले से खुले रखकर उड़ान भरेगा, जो 2025 में एनवीएस-02 की नाकामी के बाद किया गया बड़ा बदल है।

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श्रीहरिकोटा: भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली नाविक कई महीनों से दिक्कत में है। शुक्रवार (30 अक्टूबर) रात 11.51 बजे इसरो उस दिक्कत को दूर करने की कोशिश करेगा।

सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट एनवीएस-03 उपग्रह लेकर उड़ान भरेगा। 24 घंटे की उलटी गिनती गुरुवार रात 11.51 बजे शुरू हुई।

यह जीएसएलवी की 20वीं उड़ान है। 50 मीटर ऊंचा, 420 टन वजनी तीन चरणों वाला यह रॉकेट 2,232 किलो के एनवीएस-03 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा में छोड़ेगा। लक्षित कक्षा का पेरिजी 170 किमी, अपोजी 37,023 किमी और झुकाव 20.75 डिग्री होगा।

इस बार इसरो ने बड़ा बदल किया है। उपग्रह के पायरो वॉल्व पहले से खुले रखकर उड़ान होगी। उड़ान के झटकों से ईंधन अलग रखने का चलन हटाकर यह फैसला लिया गया है। जनवरी 2025 में एनवीएस-02 के ऑर्बिट-रेजिंग इंजन तक कंट्रोल सिग्नल नहीं पहुंचा और उपग्रह अपनी कक्षा नहीं बढ़ा सका। जांच समिति की सिफारिशें इस उड़ान में लागू की गई हैं।

एनवीएस-03 में अंतरिक्ष उपयोग केंद्र का बना स्वदेशी रुबिडियम परमाणु घड़ी है; साथ में खरीदी गई परमाणु घड़ियां भी हैं। उपग्रह एल1, एल5 और एस — तीनों बैंड में सिग्नल भेजेगा। एल1 बैंड से स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच जैसे आधुनिक उपकरण नाविक का सिग्नल पकड़ सकेंगे।

फिलहाल नाविक के पास सिर्फ तीन कामकाजी उपग्रह हैं — आईआरएनएसएस-1बी, आईआरएनएसएस-1आई और एनवीएस-01. अपनी जगह तय करने के लिए कम से कम चार उपग्रह चाहिए, ऐसा केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 29 जुलाई को लोकसभा में बताया था। उन्होंने कहा था कि इसलिए नाविक अपने दम पर स्थान नहीं दिखा सकता, सिर्फ समय दे सकता है।

एनवीएस-03 कक्षा में पहुंचकर काम करने लगे तो कामकाजी उपग्रहों की संख्या चार हो जाएगी। इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन ने गुरुवार को तिरुपति में कहा कि यह इस साल का पांचवां मिशन है और इसके बाद चार कामकाजी नेविगेशन उपग्रह अंतरिक्ष में होंगे।

लेकिन उड़ान आधी लड़ाई है। उपग्रह को अपने इंजन से कक्षा बढ़ाकर 32.5 डिग्री पूर्व की तय जगह तक पहुंचना है। वहां जांच पूरी होने के बाद ही नाविक की अपने दम पर स्थान दिखाने की क्षमता लौटेगी।