विजयवाड़ा: कृष्णलंका थाने में हिरासत में लिए गए 25 साल के युवक की मौत पर सीबीआई ने हत्या और आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज किया है। अब तक की जांच के मुताबिक उसे कभी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। मामले में सात लोगों के नाम हैं।
यह केस 22 अक्टूबर को दर्ज हुआ, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश के बाद जिसमें जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंपी गई थी।
नामजद लोग हैं — इंस्पेक्टर सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागराजू; हेड कांस्टेबल पोटारलंका अशोक कुमार, जंजम नानी और गोरिपर्थी सांबैया; कांस्टेबल कैटेपल्ली बाबू राव; होमगार्ड कोनेटी वेंकट राजू; और निजी व्यक्ति गुलिविंडाला सुरेश।
सीबीआई ने राज्य पुलिस का मामला हत्या, षड्यंत्र, गैरकानूनी नजरबंदी, सबूत मिटाने, चोरी और आपराधिक विश्वासघात के प्रावधानों के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम की धाराओं में फिर से दर्ज किया है।
उच्च न्यायालय के फैसले में जिस राज्य एसआईटी की रिपोर्ट दोहराई गई है, उसके मुताबिक गाडे साई कृष्णा को 6 मई की सुबह करीब 3 बजे मार्कापुरम से पेंडिंग वारंट निष्पादित करने के लिए पकड़ा गया और सुबह करीब 7 बजे कृष्णलंका पुलिस को सौंप दिया गया। उसे न मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, न रिहा किया गया।
उसकी मां विजया लक्ष्मी का आरोप है कि जब वह थाने गईं तो इंस्पेक्टर ने उसे जान से मारने की धमकी दी। एसआईटी ने हिरासत की पावती, तस्वीरें, लॉकअप रिपोर्ट और आधिकारिक व्हाट्सएप संदेशों का हवाला दिया है, जिनमें उसकी मौजूदगी दर्ज है।
8 मई को उसकी जांच करने वाले एक पंजीकृत चिकित्सक ने चोट के निशान और सूजन दर्ज की। एसआईटी रिपोर्ट में दोहराए गए आरोपी सुरेश के कथन के मुताबिक साई कृष्णा की मौत 12 मई को हुई, जब उसे पेंटेकोस्ट चर्च के पास एक पुरानी इमारत में ले जाया गया था। दो आरोपियों ने कथित तौर पर शव को दोपहिया वाहन पर ले जाकर स्वर्गपुरी श्मशान में जलाया।
एसआईटी ने यह भी आरोप लगाया कि उसका फोन और सिम गोवा ले जाकर उसकी मौत की खबर के बाद सक्रिय किया गया, ताकि वह जीवित और फरार लगे। साथ ही थाने के चार सीसीटीवी हार्ड डिस्क बदले गए, प्रवेश के दो कैमरे हटाए गए और सूखे खून जैसे धब्बों को पोंछकर उन पर पेंट किया गया।
16 अक्टूबर को न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और अलापति गिरिधर की पीठ ने सीबीआई जांच, मां को 25 लाख रुपये मुआवजा और दोषी कर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश दिया। पीठ ने अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन पाया।
यह सब अभियोजन का ब्योरा है। आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया गया है और मामला अब सीबीआई के पास है।