मुंबई: सहकारी बैंकों पर लगातार 10 साल तक निदेशक रहे लोगों को इन बैंकों में काम करने और चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है। इससे राज्य के पूर्व और मौजूदा मंत्रियों तथा विधायकों समेत 100 से ज्यादा सहकार सम्राटों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। आने वाले दिनों में होने वाले जिला बैंक चुनावों से इन सभी को दूर रहना पड़ेगा।
जिला मध्यवर्ती और शहरी सहकारी बैंकों में ताकत एक जगह केंद्रित न हो, एकाधिकार टले और दूसरे योग्य उम्मीदवारों को बराबर मौका मिले, इसके लिए केंद्र सरकार ने 'बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट' में संशोधन किया। इसके तहत लगातार 10 साल या उससे ज्यादा निदेशक रहे लोगों को आगे चुनाव लड़ने पर भी रोक है। 2021 से यह प्रावधान लागू है, लेकिन पिछले पांच साल में कायदे का उल्लंघन करने वालों पर अयोग्यता की कार्रवाई नहीं हुई।
सहकार मंत्री बाबासाहेब पाटील, कोल्हापुर जिला बैंक के अध्यक्ष और चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ, कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे, वस्त्रोद्योग मंत्री संजय सावकारे, विधायक दिलीप वळसे पाटील और भाजपा विधायक प्रवीण दरेकर व प्रसाद लाड समेत करीब 900 से ज्यादा सहकार सम्राट इस बार जिला बैंक का चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। ये लोग अब अपने करीबियों और रिश्तेदारों को बैंक में उतारने की जुगत में लगे हैं।
राज्य सहकारी बैंक के प्रशासक विद्याधर अनास्कर के मुताबिक, इस कायदे से ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा। 'जिन्हें बैंक का चुनाव लड़ने से रोका गया, उन्होंने अपने रिश्तेदारों को ही बैंक में उतार दिया है। इसलिए इन बैंकों में खानदानी तंत्र में बदलाव की उम्मीद नहीं दिखती,' उन्होंने कहा।