नई दिल्ली: सौरव दास और आशुतोष रांका अब भी तिहाड़ जेल में हैं, और वजह उनके आसपास के राजनीतिक शोर से कहीं ज्यादा सीमित है। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने चल रही कार्यवाही सिर्फ 10 अक्टूबर को दोनों के हस्ताक्षर वाले शांति बॉन्ड के कथित उल्लंघन से जुड़ी है, 13 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन में दर्ज आपराधिक मामलों से नहीं।
दिल्ली एयरपोर्ट पर सीजेपी के एक प्रदर्शन से पहले निवारक हिरासत में लिए जाने के बाद दोनों ने एक साल तक 'शांति' बनाए रखने का बॉन्ड भरा था। प्रत्येक के 50 हजार रुपये का बॉन्ड देने पर उन्हें रिहा किया गया था। तीन दिन बाद जंतर-मंतर पर पार्टी के तत्काल प्रदर्शन के बाद उन्हें फिर हिरासत में लिया गया। पुलिस का आरोप था कि उनके बर्ताव ने पहले के बॉन्ड को तोड़ा।
अलग से दिल्ली पुलिस ने 13 अक्टूबर की घटना पर दो एफआईआर दर्ज कीं। कनॉट प्लेस थाने की एक एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 332 (अपराध करने के इरादे से घर में घुसना) और धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) के तहत अज्ञात लोगों पर मामला है। संसद मार्ग थाने की दूसरी एफआईआर में धारा 223ए (लोकसेवक के वैध आदेश की जानबूझकर अवहेलना) और लोकसेवकों पर हमले से जुड़ी धाराएं लगाई गई हैं। दोनों मामले क्राइम ब्रांच को भेजे गए हैं। इन एफआईआर में दास और रांका अब तक आरोपी नहीं बनाए गए।
आपराधिक मामलों की कार्यवाही न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने चलेगी, SEM के सामने नहीं। SEM सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े खास अधिकारों के लिए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी होता है। कलंदरा नाम की निवारक कार्यवाही अलग है, जिसमें मजिस्ट्रेट सिर्फ यह देख रहा है कि शांति बॉन्ड तोड़ा गया या नहीं।
सोमवार को SEM ने दास और रांका की हिरासत बढ़ाई। मजिस्ट्रेट ने कहा कि डिनोटिफाइड इलाकों में प्रदर्शन के लिए मांग करना उनकी 'आदत' है और उनमें 'कानून का कोई सम्मान नहीं'। मजिस्ट्रेट ने उनके जमानतदारों पर भी सवाल उठाए, पहचान दस्तावेजों में गड़बड़ी और अनुपालन की गारंटी पर शक का हवाला देते हुए। जमानतदारों की पहचान आदेश में छिपाई गई है।
जमानतदार वह शख्स है जो कानूनी जिम्मा लेता है कि आरोपी बॉन्ड की शर्तें मानेगा और अदालत में पेश होगा। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 485 आरोपियों और जमानतदारों के बॉन्ड के निष्पादन से जुड़ी है। धारा 486 के मुताबिक प्रस्तावित जमानतदार को बताना होता है कि वह पहले कितने लोगों का जमानतदार रह चुका है। आरोपी के उल्लंघन से जमानतदार अपने आप दोषी नहीं हो जाता और पूरी बॉन्ड रकम तुरंत देय नहीं होती। बॉन्ड की शर्तें और जब्ती की कानूनी प्रक्रिया यह तय करती हैं।
अदालत को सुरक्षा और आजादी के बीच संतुलन बनाना होता है। अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। सार्वजनिक शांति के असली खतरे को टालने के लिए निवारक शक्तियां इस्तेमाल हो सकती हैं, लेकिन इन शक्तियों से कानूनी सुरक्षा खत्म नहीं होती। फ्रैंक विटस बनाम नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (2024) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आजादी पर पाबंदियों का मकसद वैध होना चाहिए और वे मनमानी नहीं हो सकतीं।
दास और रांका ने 21 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है और जल्दी सुनवाई की मांग की है।