ब्रासीलिया: ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में जीत हासिल कर चौथे कार्यकाल में वापसी की। लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो ने नतीजा मानने से इनकार कर दिया है।
ब्राजील के सर्वोच्च चुनाव न्यायालय के आंकड़ों के मुताबिक लूला को 51.79 फीसदी (6.42 करोड़) और बोल्सोनारो को 48.21 फीसदी (5.98 करोड़) वोट मिले। करीब 44 लाख वोट के अंतर से लूला जीते।
1988 में लोकतंत्र की बहाली के बाद पहली बार कोई ऐसा उम्मीदवार राष्ट्रपति बना है जो पहले दौर में हार चुका था। 4 अक्टूबर के पहले दौर में बोल्सोनारो को 47.03 फीसदी और लूला को 45.16 फीसदी वोट मिले थे।
दूसरे दौर में लूला ने करीब 1.03 करोड़ वोट जोड़े। उन्होंने मिनास जेराइस राज्य पलटा — पहले दौर से दूसरे दौर में बदलने वाला यह अकेला राज्य रहा। पूर्वोत्तर ब्राजील के सभी नौ राज्यों में उनका वोट प्रतिशत बढ़ा और रियो डी जेनेरो तथा माकापा समेत 211 नगरपालिकाओं में वे दूसरे स्थान से पहले स्थान पर आए।
बोल्सोनारो ने ब्रासीलिया में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए नतीजे को "अकल्पनीय" बताया और चुनाव रद्द करने की मांग की। उन्होंने मतदान का समय दो घंटे बढ़ाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ओर इशारा करते हुए कहा कि "खेल के नियम बीच में बदल दिए गए"।
लेकिन समय बढ़ाने की मांग दोनों उम्मीदवारों के प्रचार दल ने ही की थी। लूला की टीम ने कई शहरों में बसों की कमी से मतदाताओं को रोके जाने का आरोप लगाया था, जबकि बोल्सोनारो की टीम ने दक्षिण में खराब मौसम का मुद्दा उठाया था। सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष ने नतीजे की पुष्टि की है और चुनाव कानून विशेषज्ञों के मुताबिक नतीजा रद्द होने की संभावना बहुत कम है।
लूला का नया कार्यकाल 5 जनवरी 2027 से शुरू होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से तनावपूर्ण संबंध उनके सामने बड़ी चुनौती रहेंगे।
फ्लावियो बोल्सोनारो पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं। सत्ता पर कब्जे की साजिश के मामले में सजा काट रहे जायर बोल्सोनारो फिलहाल घर में नजरबंद हैं।
सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लूला को बधाई दी। सोशल मीडिया पर उन्होंने भारत-ब्राजील रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत व विस्तृत करने के लिए मिलकर काम करने की इच्छा जताई और ग्लोबल साउथ की साझा प्राथमिकताओं तथा अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण विश्व के प्रयासों का जिक्र किया।
ब्राजील के इस नतीजे से लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी नेताओं की लगातार जीत की कड़ी थम गई है, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है।