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पारंपरिक राजनीति को चुनौती: युवाओं का असली 'विरोधी पक्षनेता' अभिजीत दिपके

महाराष्ट्र में विपक्ष फिलहाल असमंजस में दिख रहा है, जबकि सड़क और सोशल मीडिया पर युवाओं के अधिकारों की लड़ाई नई ऊंचाई पर पहुंच गई है। इसी पृष्ठभूमि में देखते हैं कि अभिजीत दिपके क्यों अलग दिखते हैं।

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'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के अभिजीत दिपके, छत्रपति संभाजीनगर

स्थापित राजनीतिक घरानों की विरासत वाले विधायक और नेता अब भी विधानमंडल के नियमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक समीकरणों में उलझे हैं। इसी बीच छत्रपति संभाजीनगर के 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) से चर्चा में आए अभिजीत दिपके ने सीधे युवाओं के दिल को छुआ है। अब राज्य के हर कोने से यह सुर उठने लगा है, "संसदीय पद हो या न हो, महाराष्ट्र के बेरोज़गार और छात्रों के असली युवा विरोधी पक्षनेता अभिजीत दिपके ही हैं।"

स्थापित नेताओं बनाम सीधा संघर्ष: दिपके क्यों आगे दिखते हैं? विधायक रोहित पवार के पास शरद पवार की विचारधारा और एक बड़े दल की ताकत है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन पारंपरिक नेता पार्टी के ढांचे, वोट बैंक के गणित और वरिष्ठ नेताओं की सहमति के बिना कदम नहीं उठा सकते। इसके उलट अभिजीत दिपके किसी राजनीतिक दल के 'गुलाम' नहीं हैं। उन्हें किसी हाईकमान को खुश नहीं करना, न ही विधायकी या सांसदी के भविष्य के समीकरण साधने हैं। यही बेबाक अंदाज़ उन्हें रोहित पवार से ज़्यादा भरोसेमंद बनाता है।

अभिजीत दिपके की लोकप्रियता और नेतृत्व के प्रमुख पहलू:

1. 'Gen Z' और छात्रों की नब्ज़ पकड़ने वाला नेता: बोस्टन विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने वाले दिपके ने नौकरी या कारोबार के पीछे भागने के बजाय महाराष्ट्र में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों, संविदा कर्मचारियों और बेरोज़गार युवाओं की तकलीफों को आवाज़ दी। पारंपरिक राजनीतिक भाषणबाज़ी से ऊबी नई पीढ़ी को दिपके की व्यंग्यात्मक, दो टूक और सीधी भाषा भाती है।

2. 'CJP' का डिजिटल तूफ़ान से सड़कों के संघर्ष तक: दिपके उन तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स जैसे नहीं हैं, जो ट्विटर (X) या इंस्टाग्राम पर वीडियो बनाकर चुप बैठ जाते हैं। शिवाजी पार्क हो, पुणे का अलका टॉकीज चौक हो या संभाजीनगर की सड़कें, उन्होंने हज़ारों छात्रों को बिना किसी राजनीतिक झंडे के सड़क पर उतारने की ताकत दिखाई है। नेताओं की सभाओं में भीड़ लानी पड़ती है, लेकिन दिपके की एक अपील पर छात्र अपनी जेब से खर्च करके आंदोलन में शामिल हो जाते हैं, यही उनकी असली ताकत है।

3. रोहित पवार को भी दिपके के आंदोलन का संज्ञान लेना पड़ा: पुणे और मुंबई में MPSC छात्रों का आंदोलन भड़का, तब कई स्थापित नेताओं की नींद देर से खुली। खुद विधायक रोहित पवार को भी दिपके के रुख का समर्थन करना पड़ा, और यही दिपके की नैतिक जीत को दिखाता है। जहां व्यवस्था को झुकाने के लिए सत्ताधारियों पर दबाव बनाना होता है, वहां विधायक के अधिकारों से ज़्यादा दिपके का सड़क पर उमड़ा जनआक्रोश असरदार दिखा।

4. राजनीतिक स्वार्थ से दूर 'अराजनीतिक' संघर्ष: विधायक रोहित पवार जब सवाल उठाते हैं, तो उसके पीछे आने वाले चुनाव, पार्टी के वोट बैंक और महायुति सरकार को घेरकर अपने गठबंधन को फायदा दिलाने का राजनीतिक मकसद छिपा नहीं रहता। लेकिन दिपके के संघर्ष का कोई राजनीतिक रंग नहीं है। विपक्ष हो या सत्ताधारी, जो भी छात्रों के हित के आड़े आया, उन्होंने उसे बराबर सख्ती से घेरा है।

पद नहीं, आम लोगों का भरोसा ज़रूरी है! संसदीय लोकतंत्र में 'विरोधी पक्षनेता' का संवैधानिक पद निश्चित रूप से विधायक या सांसद के पास होता है। लेकिन लोकतंत्र की असली आत्मा जनता की आवाज़ बनने में है। रोहित पवार के पास राजनीतिक विरासत और विधानमंडल का मंच ज़रूर है, लेकिन सड़क पर उतरकर व्यवस्था की आंखों में आंखें डालकर जवाब मांगने का जो साहस अभिजीत दिपके ने दिखाया है, उसी ने आज महाराष्ट्र के लाखों युवाओं के मन में उन्हें असली 'युवा विरोधी पक्षनेता' की जगह दिलाई है।