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डोंबिवली की जुड़वां बहनें प्रेशा और रेशवी साढ़े सात साल में 200 किले चढ़ीं

डोंबिवली की साढ़े सात साल की जुड़वां बेटियां प्रेशा और रेशवी ढाई साल की उम्र से सह्याद्रि के करीब 200 किलों तक पहुंच चुकी हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रति उनकी भक्ति इस सफर की प्रेरणा है।

लेखक: mukhymantri.com· · 2 मिनट में पढ़ें
डोंबिवली की जुड़वां बहनें प्रेशा और रेशवी, जिन्होंने 200 किले चढ़े हैं
फ़ोटो: sahyadri.youngest.twintrekkers

शिवनेरी पर पहला कदम और माता-पिता के संस्कार

यह सफर सिर्फ किला चढ़ने का नहीं, बल्कि खून के हर कतरे में बसी शिवभक्ति का है। जिस उम्र में बच्चे मां की गोद से उतरकर ठीक से चलना भी नहीं संभाल पाते, उस उम्र में ढाई साल की इन बच्चियों को पिता परेश और मां रेश्मा ने गोद में लेकर शिवनेरी किले की राह पकड़ी थी। शिवाजी महाराज की जन्मभूमि की उस पवित्र हवा ने नन्हे मन को मानो मंत्रमुग्ध कर दिया। यहीं से इन दोनों की जिंदगी ने एक अलग मोड़ लिया। अपार ऊर्जा, आंखों में महाराज के पराक्रम की चमक और मन में गहरी निष्ठा लेकर इन दोनों ने तीसरे साल में ही 12 किले फतह कर लिए और ‘इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में नाम दर्ज कराया। पर उनका लक्ष्य कोई रिकॉर्ड बनाना नहीं था। उनके लिए हर किला देवघर जैसा है और हर चट्टान इतिहास की जीती-जागती गवाही। धूप, हवा, बारिश या शरीर पर खरोंच डालने वाले कांटेदार रास्तों की परवाह किए बिना इन बच्चियों ने हाल ही में महाराष्ट्र के सबसे कठिन माने जाने वाले ‘धोडप’ किले को फतह करके 200 के आंकड़े का जादुई सफर पूरा किया।

यह मिट्टी नहीं, साक्षात तीर्थ है!

“हमारा आज का अस्तित्व, यह सांस और यह धरती सिर्फ छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके पराक्रमी मावलों की वजह से है,” इन दोनों के मन में यह भाव कितनी गहराई से बैठा है, यह देखकर किसी की भी आंखें भर आएं। मावलों के खून से पावन हुई सह्याद्रि की मिट्टी को वे सिर्फ धूल नहीं मानतीं, बल्कि माथे पर लगाने वाला पवित्र तीर्थ मानती हैं। इसीलिए जिस-जिस किले पर उनके नन्हे कदम पड़े, वहां की मुट्ठी भर मिट्टी और पत्थर उन्होंने देवघर की मूर्ति की तरह दिल से संभालकर रखे हैं। 175 किलों का पड़ाव पार करने के बाद ये बच्चियां अपने प्यारे राजा के रायगढ़ पर हुए शिवराज्याभिषेक समारोह में वह पवित्र मिट्टी साथ ले गईं। हजारों शिवभक्तों और मान्यवरों की मौजूदगी में जब उस शिवतीर्थ की मिट्टी का तिलक माथे पर लगा, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति के रोंगटे खड़े हो गए और हर किसी का सीना गर्व से भर आया।

अध्ययन, आदर और ममता भरा संवाद

किसी भी किले की चढ़ाई शुरू करने से पहले ये बहनें उस किले का इतिहास, उसका ऐतिहासिक महत्व और रास्तों को गहराई से पढ़ती हैं। किले पर आने वाले हर दुर्गप्रेमी और शिवभक्त से वे बड़े अपनेपन से इतिहास की बातें करती हैं। पैरों में सह्याद्रि का बल और चेहरे पर निर्दोष मुस्कान लिए तेजी से किले चढ़ने वाली इन वीरांगनाओं को देखकर दुर्गप्रेमियों के हाथ अपने-आप सम्मान में जुड़ जाते हैं। आज के आधुनिक दौर में जब बच्चों को मोबाइल की लत लग जाती है, ऐसे में माता-पिता ने बेटियों को मोबाइल से दूर रखकर सह्याद्रि की समृद्धि और शिवविचारों के अमृत जैसे संस्कार दिए। उनकी तपस्या आज रंग लाई है। प्रेशा और रेशवी की इस अनूठी उपलब्धि के आगे पूरा महाराष्ट्र नतमस्तक है, और इन लाड़ली बेटियों पर हर तरफ से आशीर्वाद बरस रहा है।